Category Archives: Language and Literature

Lessons Learnt From The Faizabad Book Fair

Kids

Contrary to popular belief, children still show a lot of interest and enthusiasm towards books.

The Faizabad book fair was organized during 30 October to 7 November 2018. We planned to visit it on 1st November after a day had passed and the vendors had put up their stalls and settled down. The governor of U.P. was scheduled to visit on 2nd November, so 1st was the best option. Continue reading

The Song Lives On: Looking Back At The Gita

7325996116_9995f40082_nIt is said that a classic is a book which has never finished saying what it has to say. Admirers and followers of the Gita say the same thing, i.e., even after years of study and analysis, every time someone reads the scripture, new meanings and messages come out of it. It is always fresh, always new. I do not oppose this assertion, and my only concern has always been that Indians have always considered Gita as a symbol or a label, to take oath in courts, as a token to prove their religious nature, truthfulness, attachment to duty and so on. Very few people ever take the trouble to open it and see what actually is written on those pages. Treatment of Gita is no different from that of Swami Vivekananda — the moment children or youth open their messages, their parents become afraid that they are going to become monks! And of course, parents’ own desires and ambitions are attached to the children, so why would they allow that to happen? Continue reading

हम सब भारतवासी भाई-बहन हैं !

42827361365_c9c035c13c_n

photo credit: Beegee49 Happy Children via photopin (license)

मुझे अपनी मित्रमण्डली में चल रही एक विशेष विषय पर बातचीत याद आ रही है । आप तो जानते ही हैं, विवाहित मित्रों की एक ही तो समस्या होती है — अपने अविवाहित रह गए मित्रों का विवाह । और मेरी समस्या थी कि जब भी मैं किसी कन्या को पसंद आता, वह झट-से मुझे अपना भाई बना लेती — ‘तुम्हारी शक्ल मेरे भाई से मिलती है’ । फिर जैसे हिन्दू लोग मूर्ति को ईश्वर मानकर उसकी पूजा करते हैं, उसी प्रकार मुझे अपने भाई का प्रतीक मानकर राखी आदि बाँधने लगतीं । और हम न इधर के रहे न उधर के — असली भाई तो थे ही नहीं, और संबंधी भी बन नहीं पाए । जब असली भाई आ गया, तो हमें सुरेश वाडकर का गाना सुनने के लिए छोड दिया गया — साँझ ढले गगन तले हम कितने एकाकी . . . । Continue reading

कितना आवश्यक है हिन्दी में अंग्रेजी शब्दों का बढता प्रयोग ?

hindi

स्रोत : http://kiranbatni.com

हिन्दी दैनिक जनसत्ता में प्रकाशित एक पत्र में अभिषेक त्रिपाठी ने कुछ विद्वानों के इस प्रस्ताव पर टिप्पणी की है कि यदि हिन्दी भाषा में अंग्रेजी आदि भाषाओं से शब्द मिला लिए जाएँ, तो इसे अधिक समृद्ध बनाया जा सकता है । Continue reading

ये क्या देखता हूँ

रचनाकार — प्रदीप बहुगुणा ‘दर्पण’

7977933199_54020ee544_n

ये क्या देखता हूँ

किसी बुरी शै का असर देखता हूं ।
जिधर देखता हूं जहर देखता हूं ।।

रोशनी तो खो गई अंधेरों में जाकर ।
अंधेरा ही शामो सहर देखता हूं ।। Continue reading

क्यों आग बुझा नहीं देते

रचनाकार – ऋतेश मिश्रा 

29785454138_db01161131_n

                    क्यों आग बुझा नहीं देते

                    क्यों आग बुझा नहीं देते?
                    नफरत से प्रचंड कर, विसंगति से विपुल कर
                    क्यों चिनगारियों को मशालों मॆं धधका देते?
                    क्यों आग बुझा नहीं देते? Continue reading

ख्वाइशें कुछ ऐसी

रचनाकार – हेमा जोशी

25298250528_ce32910365_n

photo credit: hehaden Faded glory, fading light via photopin (license)

ख्वाइशें कुछ ऐसी

ख्वाइशें कुछ ऐसी, नन्हे जुगनू जैसी
अंधेरे में उस उजाले की तरह, जिसे उंगलियाँ छूना चाहती हैं
हैं अनगिनत तारों की तरह,
जिन्हें मैं हर रात निहारती हूँ, बातें करती हूँ
और छू लेना चाहती हूँ
हैं प्यारी, अनगिनत ओस की बूंदों की तरह
ये ख्वाइशें कुछ ऐसी,
जो उड़ जाना चाहती हैं पंख लगाकर Continue reading