Tag Archives: Humour

Three Takes On ‘Superstitious India’

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Photo by Amit Misra

I usually say that we as a people are not a scientific community. I still maintain this opinion. I do not concern here with what might be the reason behind such a mindset of Indians. May be in a future post we would delve deeper into that issue. Today I restrict myself with what makes me form such a strong opinion against intellectual health of Indians. Continue reading

Three Takes On ‘The Artist In You’

30379756720_867fa6819f_nThere are two parts of any artistic pursuit — one is skill and the other is art. As you might have guessed, art is the soul of the work whereas skill lends an aesthetic appeal to the piece of art. It is just like the body which lends a basis for the human soul to live in —  without body the soul cannot stay; yet, without soul, the body has no value. Continue reading

हम सब भारतवासी भाई-बहन हैं !

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photo credit: Beegee49 Happy Children via photopin (license)

मुझे अपनी मित्रमण्डली में चल रही एक विशेष विषय पर बातचीत याद आ रही है । आप तो जानते ही हैं, विवाहित मित्रों की एक ही तो समस्या होती है — अपने अविवाहित रह गए मित्रों का विवाह । और मेरी समस्या थी कि जब भी मैं किसी कन्या को पसंद आता, वह झट-से मुझे अपना भाई बना लेती — ‘तुम्हारी शक्ल मेरे भाई से मिलती है’ । फिर जैसे हिन्दू लोग मूर्ति को ईश्वर मानकर उसकी पूजा करते हैं, उसी प्रकार मुझे अपने भाई का प्रतीक मानकर राखी आदि बाँधने लगतीं । और हम न इधर के रहे न उधर के — असली भाई तो थे ही नहीं, और संबंधी भी बन नहीं पाए । जब असली भाई आ गया, तो हमें सुरेश वाडकर का गाना सुनने के लिए छोड दिया गया — साँझ ढले गगन तले हम कितने एकाकी . . . । Continue reading
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Here comes winter!

Photo Sources:

Vikram: Filmibeat.com; Ranveer Singh: Indian Express; Akshay Kumar: Financial Express; Mammootty: Filmibeat.com; Suniel Shetty: Hindustan Times; Jr NTR: Filmibeat.com; Nivin Pauly: Filmibeat.com; Ram Charan: mirchi9.com.

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जो गरजते हैं वो बरसते नहीं

4380042754_54ae574115_nयदि किसी से “जो गरजते हैं वो बरसते नहीं” का अर्थ उदाहरण देकर समझाने के लिए कहा जाए, तो मेरे विचार से अधिकांश लोग वेंकटेश प्रसाद और आमिर सुहेल के द्वन्द्व का वर्णन करेंगे । घटना है बीस साल पहले 15 मार्च 1996 की । कितनी आश्चर्यजनक बात है न, कि सभी ऐतिहासिक घटनाएँ हमारी स्मृति के रसातल से 20 साल बाद ही सतह पर आती हैं । ओ हेनरी की इसी शीर्षक की एक कहानी है, और विश्वजीत-अभिनीत एक हिन्दी फिल्म भी है । बहरहाल, हम बात कर रहे हैं 1996 की । Continue reading