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जो गरजते हैं वो बरसते नहीं

4380042754_54ae574115_nयदि किसी से “जो गरजते हैं वो बरसते नहीं” का अर्थ उदाहरण देकर समझाने के लिए कहा जाए, तो मेरे विचार से अधिकांश लोग वेंकटेश प्रसाद और आमिर सुहेल के द्वन्द्व का वर्णन करेंगे । घटना है बीस साल पहले 15 मार्च 1996 की । कितनी आश्चर्यजनक बात है न, कि सभी ऐतिहासिक घटनाएँ हमारी स्मृति के रसातल से 20 साल बाद ही सतह पर आती हैं । ओ हेनरी की इसी शीर्षक की एक कहानी है, और विश्वजीत-अभिनीत एक हिन्दी फिल्म भी है । बहरहाल, हम बात कर रहे हैं 1996 की । Continue reading

बिना थके थूकते रहे

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Photo source: The Times of India

— यदि आप हमसे पूछें तो रसखान जैसा कवि हिन्दी साहित्य में दूसरा कोई नहीं है । – कहकर उसने अपनी गर्दन को कबूतर के जैसे एक ओर घुमाया और सडक पर थूका, फिर अपने विचारों का सारांश बताया –

— लोगों को तो सूर, तुलसी, कबीर और आजकल निराला, दिनकर से आगे कुछ दिखता ही नहीं है । वरना रसखान को तो समझो बस रस की खान । – कहकर उसने फिर से थूका । Continue reading

सोशल नेटवर्किंग साइटों पर तर्क करने से पहले यह विचार करें

28259439186_7ab5169fd5_nयदि सोशल नेटवर्किंग साइटों पर होने वाले तर्कों को देखें तो लगता है कि हम लोगों के पास किसी भी समस्या का समाधान नहीं है । इससे अधिक बुरी बात यह है कि पुराने मुद्दे सुलझते नहीं, और नए मुद्दे आते जाते हैं । मुझे तो यहाँ तक लगता है कि हममें विचार करने की शक्ति का ही अभाव है । बात अनन्त काल तक तर्क करते रहने और किसी भी नतीजे तक न पहुँचने की नहीं है । बात है तर्कों और विचार-विमर्श की गुणवत्ता की । किसी भी मुद्दे पर समाज की प्रतिक्रिया पढकर अब झल्लाहट ही होती है । फिर राजनेताओं और मंत्रियों की भाषा शैली ! ध्यान से देखें तो पाएँगे कि अधिकतर बातों में अथवा टिप्पणी में  कोई संदेश होता ही नहीं है । इस पर प्रश्न उठता है कि यदि हम किसी भी विषय पर तार्किक टिप्पणी ही न कर सकें अथवा दूसरे के तर्क को सुन-समझ ही न सकें तो फिर हमारी 15 वर्षों की शिक्षा का क्या लाभ ? Continue reading

प्रतिच्छाया

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हमारा समस्त जीवन मानों प्रतिबिम्ब को देखने में ही बीतता है और मानों हम लोग उसी से संतुष्ट हैं । प्रत्येक वस्तु हमें किसी अन्य का स्मरण कराती है । किसी तत्व का विवरण देने के लिए हम किसी दूसरे तत्व का ही आधार लेते हैं । हरिणि से नेत्र, सिंह के सदृश कटि आदि । क्या हम बिना किसी उपमा के किसी वस्तु को उसी के रूप में, यथार्थ रूप में नहीं देख सकते ? यानी पर्वत को पर्वत के ही जैसे, रोटी को रोटी के ही जैसे, सूर्य को सूर्य के ही जैसे । बिना अलंकार के, बिना भ्रांति की रचना किए, जो समक्ष स्पष्ट रूप से विद्यमान है, क्या उसका निरूपण कर सकते हैं ?

photo credit: Anvica Espejo, espejito mágico ¿Qué nube es la más hermosa? via photopin (license)

अनायास प्राप्त वस्तु का सम्मान नहीं किया जाता

24622630432_a01bc98deb_nपेड-पौधे, जन्तु-जानवर आदि के बारे में गहरी जानकारी रखने में मेरी कभी दिलचस्पी नहीं रही, इसलिए मुझे अधिकांश पेडों और जन्तुओं का नाम नहीं पता । यह स्थिति और अधिक कठिन तब हो जाती है जब किसी दूसरी भाषा में कोई लेख पढा जा रहा हो । अब जब अपनी ही भाषा में पौधों का नाम नहीं पता, तो भला दूसरी भाषा में क्या पता चलेगा ! Continue reading

एक सरकारी कर्मचारी की मौत : आन्तोन चेखोव (अनुवाद)

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आन्तोन पावलोविच चेखोव (1860-1904), स्रोत – विकिमीडिया

एक सुन्दर शाम को, लगभग उतना ही सुदर्शन एक्जिक्यूटर, इवान द्मित्रिच चेर्व्याकोव, कुर्सियों की दूसरी पंक्ति में बैठा था और दूरबीन से “कॉर्नविल की घंटियाँ” (ओपेरा) देख रहा था । वह देख रहा था और स्वयं को आनन्द की पराकाष्ठा पर बैठा अनुभव कर रहा था । लेकिन अचानक . . . कहानियों में अक्सर यह “लेकिन अचानक” मिलता है । लेखकों का कहना सच है: जीवन अप्रत्याशित घटनाओं से कितना भरपूर है ! लेकिन अचानक उसका चेहरा बिगडा, आँखें घूम गईं, साँसें रुक गईं . . . उसने आँखों से दूरबीन हटाई, झुका और . . . आपछू !!!  छींका, जैसा कि आप देख ही रहे हैं । छींकना किसी को भी कहीं भी मना नहीं है । लोग छींकते हैं, पुलिस अधिकारी छींकते हैं,  और कभी कभी तो गोपनीय सलाहकार भी । सभी छींकते हैं । चेर्व्याकोव जरा भी शर्मिंदा नहीं हुआ, रुमाल से पोंछा और एक सज्जन व्यक्ति की तरह अपने चारों तरफ देखा: कहीं उसने अपनी छींक से किसी को परेशान तो नहीं किया ? Continue reading

21 फरवरी – अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस

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शहीद मिनार, ढाका विश्वविद्यालय, बांगलादेश ।

1952 में आज ही के दिन ढाका विश्वविद्यालय, जगन्नाथ कॉलेज, तथा ढाका मेडिकल कॉलेज के छात्रों ने बंगाली को पूर्व पाकिस्तान की दो राष्ट्रीय भाषाओं में से एक बनाने की माँग करते हुए प्रदर्शन किया । ढाका उच्च न्यायालय के सामने उस प्रदर्शन पर पुलिस ने (जो उस समय पाकिस्तान के अधीन थी) गोली चलाकर कई छात्रों की निर्मम हत्या कर दी । उस घटना को स्मरण करते हुए वर्ष 2000 से यह दिन संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है  (स्रोत – विकिपीडिया) । Continue reading