Monthly Archives: July 2016

Brain Drain

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If you have gone to our villages, or maybe low-income homes in our cities and towns, you must have noticed the prevailing love and sweetness in most of them. Those people might not have a four wheeler, they might not be able to afford a gala dinner every other day, or they might not even wear fashionable expensive clothes, but a sort of satisfaction is there. Of course, they do have a desire for better and more, but with a satisfaction with what they already have. Continue reading

मेंढक

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कुछ 2-4 साल पहले एक विशेष बंगाली उपन्यास पढने को मिला । उपन्यास वर्तमान समय के परिप्रेक्ष्य में लिखा गया था । कहानी में पति-पत्नी अलग हो चुके थे, माँ फ्रांस में बस चुकी थीॆ, और बेटा जो अब 25 वर्ष के आसपास था, अपने पिता के साथ रहता था । पिता-पुत्र में मैत्रीपूर्ण संबंध थे जो कि अन्यथा भारतीय समाज में विरले ही देखे जाते हैं । जो भी हो, उन दोनों के बीच हर रात को खाने के आसपास किसी न किसी बात पर वाद-विवाद होता ही रहता था । और अधिक याद नहीं । लेकिन हाँ, ऐसे ही एक विवाद के समय बेटे ने अपने पिता को एक बहुत ही सुंदर कहानी सुनाई थी, जो मुझे थोडी-बहुत याद है । उसे मैं आपके सम्मुख प्रस्तुत करना चाहता हूँ । कहने की आवश्यकता नहीं कि कहानी का सार रचनाकार का ही है, मात्र शब्द ही मेरे हैं । साथ ही, यह अनुवाद नहीं है, बस सारांश समझ लीजिए । कृपया त्रुटियों को क्षमा करें ।
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Perseverance

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In Kathopanishad, Yamaraj tells Nachiketa, “This (Brahman) rises and sets”.

Though Yamaraj spoke those words in the context of Yoga and spiritual practices, I think it could be said of every self-discipline one undertakes — for health, for study, for scholarship, for profession, or for relationships — everything. It rises and sets. As long as you keep practising, your capability, strength and state rise — improve; however, the moment you stop, they set down — fall back. Continue reading