जो गरजते हैं वो बरसते नहीं

4380042754_54ae574115_nयदि किसी से “जो गरजते हैं वो बरसते नहीं” का अर्थ उदाहरण देकर समझाने के लिए कहा जाए, तो मेरे विचार से अधिकांश लोग वेंकटेश प्रसाद और आमिर सुहेल के द्वन्द्व का वर्णन करेंगे । घटना है बीस साल पहले 15 मार्च 1996 की । कितनी आश्चर्यजनक बात है न, कि सभी ऐतिहासिक घटनाएँ हमारी स्मृति के रसातल से 20 साल बाद ही सतह पर आती हैं । ओ हेनरी की इसी शीर्षक की एक कहानी है, और विश्वजीत-अभिनीत एक हिन्दी फिल्म भी है । बहरहाल, हम बात कर रहे हैं 1996 की ।

वेंकटेश प्रसाद और आमिर सुहेल बंगलौर में आमने सामने थे । प्रसाद की गेंद को सुहेल बाउण्डरी के पार पहुँचा रहे थे । आखिर में उन्होंने प्रसाद को देखते हुए बल्ला उठाया और चुनौती तथा अपमानपूर्वक सीमारेखा की ओर इंगित किया । मतलब साफ था — वह प्रसाद को कह रहे थे कि इसी तरह उनकी हर गेंद सीमारेखा के पार पहुँचाई जाएगी । प्रसाद ने कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया । किंतु अगली ही गेंद पर सुहेल को क्लीन बोल्ड कर दिया । जब तक नयन मोंगिया, विनोद कांबली, सचिन तेंदूलकर, वेंकटपति राजू तथा जवगल श्रीनाथ प्रसाद को बधाई देने और शांत करने के लिए आए, तब तक प्रसाद की उपलब्धि क्रिकेट इतिहास के पृष्ठों पर स्वर्णिम अक्षरों में लिखी जा चुकी थी । कमेण्टेटर चिल्ला रहे थे कि इससे बेहतर जवाब किसी बल्लेबाज को दिया ही नहीं जा सकता । सच ही तो, प्रसाद को बरसना था, सो उन्होंने गरजने पर समय और शक्ति का अपव्यय नहीं किया ।

दूसरे शब्दों में प्रसाद “जो बरसते हैं वह गरजते नहीं” के सिद्धान्त का ही अनुकरण कर रहे थे ।

कभी-कभी मैं इस गरजने और बरसने के दर्शन शास्त्र पर गंभीरता से विचार करता हूँ । यदि आप ध्यान से देखें तो पाएँगे कि प्रसाद का कृत्य यह तो दर्शाता है कि जिन्हें बरसना होता है, वे गरजा नहीं करते, लेकिन यह नहीं बताता कि जो गरजते हैं वे आखिर बरसते क्यों नहीं हैं ? तो मित्र, कई वर्षों के प्रयोग, विश्लेषण तथा गहन अध्ययन के बाद मैंने इसका उत्तर ढूँढ निकाला है और अपने दर्शन की रचना की है । जैसे-जैसे मैं आयु में आगे बढ रहा हूँ, तथा नए-नए अनुभव प्राप्त कर रहा हूँ — अपने जीवन से, दूसरों के जीवन से, आसपास के वातावरण तथा समाज को देखकर, वैसे-वैसे मेरी अपने इस फ़लसफ़े पर आस्था दृढ से दृढतर होती जाती है कि — “जो गरजते हैं, उन्हें बरसने की जरूरत ही नहीं पडती“ !

आप ही बताइए, जब गरजने से ही काम चल सकता है, तो भला बेकार में बरसा क्यों जाए ? अब आप समझे, अल्पवृष्टि और सूखे का कारण ? दोस्त, आजकल गरजने का जमाना है, भला कहीं कोई बरसता भी है ? हमने तो कभी नहीं देखा । लोग आजकल बस “जानता है मैं कौन हूँ”, “इसके बाद दुबारा ऐसा किया तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा” कहकर ही छोड देते हैं । मुझे तो लगता है कि धीरे-धीरे हमारे समाज से बरसने की संस्कृति का लोप हो रहा है । सूखा वैसे ही पडा है, आए दिन लोग पानी-पानी चिल्लाते हैं । तभी तो फिल्में युद्ध संग्रहालय (war museum) की तरह हमारे बरसने के स्वर्णिम इतिहास को इलैक्ट्रॉनिक माध्यम से संरक्षित करने की आप्राण चेष्टा कर रही हैं । साथ ही नेतागण अपने स्वार्थ के लिए ही सही, लोगों में वैमनस्य के बीज बोकर मार-पिटाई और दंगा-फसाद के अवसर देते रहते हैं । इससे लोगों के हाथों की कुछ तो कसरत होगी । नहीं तो आगामी भविष्य में यह एक परी कथा ही बन कर रह जाएगी । लेकिन इसके बाद भी लोगों का रूझान दिन-पर-दिन गरजने की ओर ही देखा जाता है ।

बॉलीवुड की बात लें तो हीरो पहले गरजता है, फिर और जोर से गरजता है, तब कहीं जाकर बरसता है । मैंने गत कुछ महीने तेलुगू फिल्मों का हिसाब लगाया, औसतन हर फिल्म में हीरो 15 मिनट गरजता है, और 5 मिनट बरसता है । कई बार तो फिल्म के शुरू में एक बार ही बरसता है, और बाकी ढाई घण्टा मात्र गरज कर काम चला देता है । लोग आक्षेप लगाते हैं कि बच्चे फिल्में देखने से बिगडते हैं । अच्छा आप बताइए, आपकी जान पहचान में कितने लडके अक्षय कुमार की तरह मकान की छत से कूदने की काबलियत रखते हैं, या रवि तेजा के जैसे एक बार जमीन पर पैर पटक कर भूकम्प ला देते हैं ? मैंने तो नहीं देखा । बच्चे सीखते हैं गाने, नाचने, और अपनी क्लास में पढने वाली प्यारी-सी लडकी के घर का चक्कर लगाने जैसे शांतिप्रिय क्रियाकलाप । इसलिए मेरा यह कहना सत्य है कि फिल्में बरसना नहीं सिखातीं, बल्कि बरसने के इतिहास के संग्रहालय का कार्य करती हैं ।

साहित्य भी इस नए फ़लसफ़े से अछूता नहीं है । ‘राग दरबारी’ उपन्यास के एक दृश्य में श्रीलाल शु्क्ल दो भाइयों के विषय में कहते हैं — “उन्होंने काफी गालियाँ सीख ली थीं, जिनके द्वारा वे सभी पारस्परिक विवाद बिना मार-पिटाई के निबटा लिया करते थे”(देखें — राग दरबारी, राजकमल प्रकाशन) ।

गरजने के सिद्धान्त को विशद में जानना हो तो हमें अपने आदिग्रन्थों की शरण लेनी चाहिए । इस दर्शन का उत्कृष्ट उदाहरण महाभारत में मिलता है जब कृष्ण पाण्डवों के दूत बनकर कौरव सभा में उपस्थित हुए । उन्होंने तो मात्र संधि प्रस्ताव ही रखा था, किन्तु दुर्योधन मूर्खतावश बरसने लगा, वह भी पहले गरजे बिना । और उस कृत्य का परिणाम क्या हुआ था, यह तो आप जानते ही हैं । दुर्योधन यदि जनवरी में होने वाली छिटपुट बारिश था, तो कृष्ण नियाग्रा जलप्रपात । प्रत्युत्तर में कृष्ण ने गरजने का सिद्धान्त अपनाया, केवल गरजे, मगर बरसे नहीं । तो फिर युगद्रष्टा, महायोगी होते हुए भी कृष्ण विफल क्यों हुए ? उनके गरजने के बावजूद महाभारत का रण आखिर क्यों हुआ ? असल में कृष्ण ने एक छोटी-सी गलती कर दी थी कि उन्होंने पहले ही यह बता दिया था कि वह शस्त्र ग्रहण नहीं करेंगे । सो भीषण भय पाने के बावजूद दुर्योधन आदि को यह ज्ञात था कि वह बरसेंगे नहीं, केवल गरज कर छोड देंगे । वास्तव में गरजने के सिद्धान्त की सफलता आश्रित है संशय और गोपनीयता पर, और इसमें उद्देश्य होता है प्रतिद्वन्दी या शत्रु के मन में भय उत्पन्न करना । आप अपने शक्ति भण्डारों के स्रोतों के बारे में कुछ भी नहीं कहते हैं, और परम गोपनीयता बनाए रखते हैं । इससे शत्रु के मन में संशय उत्पन्न होता है — “इतना चिल्ला रहा है, कुछ कर पाएगा ? देखने में तो दुबला-पतला सा है । क्या पता कराटे सीखकर आया हो । वैसे देखने में तो लगता नहीं । हो सकता है पिस्तौल-तमंचा साथ हो । या शायद गुण्डे कहीं आस-पास छिप कर इसके इशारे का इंतजार कर रहे हों ।” यही सब सोचते-सोचते उसका आत्मविश्वास जाता रहता है और आप जीत जाते हैं ।

महाभारत से भी पहले गरजने के सिद्धान्त का ज़िक्र हमें त्रेता युग में मिलता है । राम बरसने के सिद्धान्त में गहरी आस्था रखते थे, इसीलिए सुबाहु और ताडका का वध उन्होंने बिना किसी समारोह के शांत रूप से ही कर डाला था । किन्तु लक्ष्मण गरजने के सिद्धान्त के प्रणेता थे । मेरे विचार से आजकल गरजने के समय प्रयोग किए जाने वाले अधिकांश वाक्य सर्वप्रथम लक्ष्मण ने ही कहे थे । बालि का वध होने से सुग्रीव का तो काम निकल गया था, और वह अपने राज-काज और ऐश्वर्य में डूबकर राम के साथ की गई संधि भूल गए थे । यदि वह कलयुग रहा होता तो कोई बात नहीं थी, लेकिन त्रेता युग में वचन का बहुत महत्त्व हुआ करता था । लक्ष्मण किष्किंधा गए और सुग्रीव की राजसभा में जाकर गरजे — “अभी तुम्हारा समस्त राज्य जलाकर भस्म कर सकता हूँ ।” यदि लक्ष्मण ने यह गर्जन नहीं किया होता, तो सुग्रीव ने राम से क्षमा-याचना न की होती, हनुमान सीता-संधान के लिए न भेजे गए होते, लंका पर चढाई न की गई होती, रावण न मारा गया होता, राम की जय-जयकार न हुई होती, आडवाणी रथ पर नहीं चढ पाते ।

किन्तु इससे भी पहले सीता स्वयंवर में शिव धनुष तोडने के बाद जब परशुराम कुपित होकर जनकसभा में उपस्थित हुए, तो उनका सामना पहले लक्ष्मण ने ही किया था और वह भी गरजने के सिद्धान्त का आश्रय लेकर — “मैं चाहूँ तो पूरे ब्रह्माण्ड को अपने हाथों से उठाकर आकाश में उछाल दूँ ।” यह ओजपूर्ण शब्द त्रेता से आरम्भ होकर द्वापर, सतयुग होते हुए आज कलयुग में भी प्रतिध्वनित होते हैं । आजकल कहा जाने वाला “जानता है मैं कौन हूँ” उसी ओजस्वी वाणी की ही अनुगूँज है । गौर करने योग्य बात यह है कि गरजने के लिए प्रयोग किए जाने वाले वचनों का युक्तिसंगत होना आवश्यक नहीं है । कुछ भक्तों ने संशय प्रकट किया है कि यदि लक्ष्मण ब्रह्माण्ड को गेंद की तरह उठा लेते, तो स्वयं कहाँ खडे होते, और फिर उसे उछालते कहाँ (देखें — मानस शंका समाधान, गीताप्रेस गोरखपुर) ? इसे समझने के लिए याद रखना चाहिए कि, जैसा पहले भी कहा जा चुका है, गरजने का उद्देश्य प्रतिद्वन्दी के मन में भय उत्पन्न करना होता है । यदि आप इसमें सफल होते हैं, तो फिर आपको अपने स्वघोषित सामर्थ्य को सिद्ध करने की आवश्यकता वैसे भी नहीं पडती ।

राम मर्यादापुरुषोत्तम तथा अहंकारशून्य थे, यह सर्वजनविदित है । उन्होंने लक्ष्मण के दृष्टान्त से सीख ली और गरजने के सिद्धान्त का कुछ अभ्यास किया । जब अनेक अनुुनय-विनय के बाद भी समुद्र ने उन्हें लंका जाने का मार्ग नहीं दिया तो उन्होंने इसी गरजने के सिद्धान्त का पालन किया, धनुष पर बाण चढाया, और कहा — “मार्ग देते हो या ?” समुद्र ने मार्ग बता दिया । यदि समुद्र मार्ग नहीं बताते, तो क्या राम सचमुच बाण चला देते ? इस प्रश्न का सही उत्तर तो मात्र राम के ही पास था ।  अन्य कोई नहीं जानता ।

मेरे एक मित्र एक संस्मरण सुनाते हैं । वे एक बार रेलयात्रा कर रहे थे । उनके कम्पार्टमेण्ट में दो मध्यवयसी व्यक्तियों में पहले वाद-विवाद हुआ, फिर जोर-जोर से वाद-विवाद हुआ, और फिर घमासान वाद-विवाद हुआ । जैसा संसद में होता है न, ठीक वैसा ही । विवाद का विषय क्या था, यह महत्व का नहीं है । शायद दोनों को एक ही सीट अलॉट हो गई थी । पी वी नरसिम्हा राव के तत्वावधान में कम्प्यूटरीकृत आरक्षण अभी नया-नया शुरू हुआ था, किंतु पुरानी आरक्षण पद्धति अभी बंद नहीं की गई थी । सो इस प्रकार की त्रुटियाँ अक्सर हो जाया करती थीं, तथा रेलवे द्वारा हल भी कर दी जाती थीं । तो इन दोनों का वाक्-युद्ध जब इस परिमाण तक पहुुँच गया कि उनकी ध्वनियों से रेल के इंजन का भी कान फटने लगा और डब्बे अपने स्थान से डगमगाने लगे, तो एक सहयात्री ने धीरे से उनका कंधा थपथपाकर कहा — “अरे भाई साहब, भगवान ने आप दोनों को दो-दो हाथ दे रखे हैं, इस्तेमाल कीजिए न । जल्दी निबटारा हो जाएगा । क्यों बेकार एनर्जी वेस्ट करते हैं ।” दोनों व्यक्ति लज्जित हुए और बिना किसी शर्त के युद्धविराम करके बैठ गए । देखिए, वे भी मेरी ही तरह गरजने पर ही विश्वास करते थे । बरसने के स्थान पर उन्होंने विवाद त्याग देना ही उचित समझा ।

इससे भी बेहतर दृष्टांत तब का है जब मैं दसवीं कक्षा में पढता था । यह मानवीय शक्ति का अद्भुत उदाहरण है और प्रत्येक युवा के लिए अनुकरणीय है । हुआ यह कि दो लडकों में लडाई चल रही थी, न जाने किस बात पर । आप तो जानते ही हैं कि स्कूल में लडाई और बंगाल में हडताल तो अनन्त काल से चला आ रहा है । यही तो हमारी सांस्कृतिक धरोहर है । तो इन दोनों लडकों मेें असली वाली लडाई चल रही थी — लडाई जिसमें लडकों में छिपे मुहम्मद अली, माइक टाइसन और दारा सिंह खुलकर सामने आ जाते हैं । अंतर बस इतना ही होता है कि यहाँ कोई नियम नहीं होता, तथा प्रतियोगिता सही अर्थ में फ्री स्टाइल होती है । लडते-लडते उन दोनों में से महाकाय लडका, जो अन्यथा हमेशा सभी से जीतता आया था और न जाने कितने दांत, नाक और सिर फोड चुका था, इस बार हारने लगा । यह उसके अहंकार पर भीषण चोट थी, विशेषकर इसलिए क्योंकि दूसरा लडका यद्यपि समान कद का था, लेकिन हड्डियों का ढाँचा था । तो हार से बचने के लिए महाकाय ने “करो या मरो” रूप एक डेस्क अपनी विशाल भुजाओं से उठा ली और सिर के ऊपर ले जाकर हड्डीराजा को मारने दौडा । मैं होता तो पी टी उषा से लेकर उसैन वोल्ट तक सभी देवी-देवताओं का स्मरण कर तुरंत वहाँ से भाग जाता । लेकिन हड्डीराजा डरे नहीं, वहीं डटे रहे । जब महाकाय एकदम पास आ गया, तो हड्डीराजा ने उसकी आँखों में आँखें डालकर, अपने फेफडों की सारी ताकत का इस्तेमाल करते हुए चिल्लाकर कहा — “मार मुझे, आ, आ, मार मुझे, मार डाल । लेकिन याद रख, अगर मैं बच गया, तो फिर तू नहीं बचेगा ।” कहने की आवश्यकता नहीं कि महाकाय ने कौन सा कार्यमार्ग चुना । और यह भी कहने की आवश्यकता नहीं, कि अपनी आँखों से यह घटना देखकर मैंने क्या किया । मेरे पास दो ही विकल्प थे — या तो सोसाइटी के जिम की सदस्यता ले लेता, या हड्डीराजा से दोस्ती कर लेता । मैंने दूसरा विकल्प चुना ।

बन्धु, आज जमाना है गरजने का । तभी लोग कंधे, छाती और हाथ-पैर की जगह फेफडों का व्यायाम करने लगे हैं । देखा नहीं, बाबा रामदेव के शिविरों में कितनी भीड रहती है प्राणायाम सीखने वालों की ? कपालभाति, भस्त्रिका, भ्रामरी कितनी तरह के अभ्यास हैं । वरना योग तो श्री अयंगार भी सिखाते थे । कोई कहता है कि यह बाबा रामदेव के प्रचार-कार्य का परिणाम है, तो कोई कहता है कि यह माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी के प्रश्रय के कारण हो रहा है । अजी जाने भी दीजिए, मैं कहता हूँ कि यह सिर्फ इसलिए हो रहा है क्योंकि लोग माँसपेशियों की बजाय फेफडों की शक्ति समझ गए हैं, और बरसने का मार्ग छोडकर मात्र गरजने भर से कार्य सिद्ध करने के लिए कृतसंकल्प हैं ।

तो फिर वेंकटेश प्रसाद ने जो दृष्टान्त रखा था उसका क्या ?  बन्धु, यदि आपने कुछ संयम दिखाया होता तो पूरी बात आपको स्वयं स्पष्ट हो गई होती । माना कि प्रसाद की सुहेल को दी गई शिक्षा सर्वोत्तम मान की थी, लेकिन सुहेल भी मानों डटे हुए थे कि सीखेंगे नहीं । प्रसाद के स्पष्ट संदेश के बावजूद उन्होंने पुनः वही व्यवहार मात्र 35 दिन बाद ही दुहराया । 15 अप्रैल 1996 को । वही गाली गलौज वगैरह । लेकिन इस बार नवजोत सिंह सिद्धू के विरुद्ध । सिद्धू मेरी तरह बरसने की बजाय गरजने में ही विश्वास करते थे, सो सुहेल की दिशा में बल्ला उठाकर दौडे । उद्देश्य स्पष्ट था — “आ जा बेटा, इधर आ ।” सुहेल डर गए, और बुरी तरह डर गए । क्रिकेट के इतिहास में सुहेल के द्वारा उस प्रकार के व्यवहार का और कोई दृष्टान्त पुनः नहीं दिखाई दिया । क्या अब भी आपको गरजने के फ़लसफ़े की काबलियत पर शक है ?

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