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प्रतिच्छाया

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हमारा समस्त जीवन मानों प्रतिबिम्ब को देखने में ही बीतता है और मानों हम लोग उसी से संतुष्ट हैं । प्रत्येक वस्तु हमें किसी अन्य का स्मरण कराती है । किसी तत्व का विवरण देने के लिए हम किसी दूसरे तत्व का ही आधार लेते हैं । हरिणि से नेत्र, सिंह के सदृश कटि आदि । क्या हम बिना किसी उपमा के किसी वस्तु को उसी के रूप में, यथार्थ रूप में नहीं देख सकते ? यानी पर्वत को पर्वत के ही जैसे, रोटी को रोटी के ही जैसे, सूर्य को सूर्य के ही जैसे । बिना अलंकार के, बिना भ्रांति की रचना किए, जो समक्ष स्पष्ट रूप से विद्यमान है, क्या उसका निरूपण कर सकते हैं ?

photo credit: Anvica Espejo, espejito mágico ¿Qué nube es la más hermosa? via photopin (license)