Tag Archives: Story

Stories That Influenced Me: Foreword

4151100524_9e9d933e33_nA question is generally asked — Does literature have any social responsibility or is it yet another means of aesthetic pleasure? In fact, this question is asked not just about literature, instead about all arts. However, in this post I would not go into the debate on this issue. Continue reading

When Your Post Is Not Delivered

11357671284_3c225b66a3_nI am writing to you after a long gap. A sudden unanticipated inflow of work kept me occupied for the last two weeks. Such unexpected change in work schedule is part of scientific research. The work is not yet finished, but now I am getting used to the extra work. It also means that a lot of routine work has piled up — cleaning, organizing, refreshing social contacts, and yes, getting updated with what is going on in the world. So I sat down and browsed through the large pile of newspapers looking for anything interesting that I might have missed. Continue reading

एक सरकारी कर्मचारी की मौत : आन्तोन चेखोव (अनुवाद)

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आन्तोन पावलोविच चेखोव (1860-1904), स्रोत – विकिमीडिया

एक सुन्दर शाम को, लगभग उतना ही सुदर्शन एक्जिक्यूटर, इवान द्मित्रिच चेर्व्याकोव, कुर्सियों की दूसरी पंक्ति में बैठा था और दूरबीन से “कॉर्नविल की घंटियाँ” (ओपेरा) देख रहा था । वह देख रहा था और स्वयं को आनन्द की पराकाष्ठा पर बैठा अनुभव कर रहा था । लेकिन अचानक . . . कहानियों में अक्सर यह “लेकिन अचानक” मिलता है । लेखकों का कहना सच है: जीवन अप्रत्याशित घटनाओं से कितना भरपूर है ! लेकिन अचानक उसका चेहरा बिगडा, आँखें घूम गईं, साँसें रुक गईं . . . उसने आँखों से दूरबीन हटाई, झुका और . . . आपछू !!!  छींका, जैसा कि आप देख ही रहे हैं । छींकना किसी को भी कहीं भी मना नहीं है । लोग छींकते हैं, पुलिस अधिकारी छींकते हैं,  और कभी कभी तो गोपनीय सलाहकार भी । सभी छींकते हैं । चेर्व्याकोव जरा भी शर्मिंदा नहीं हुआ, रुमाल से पोंछा और एक सज्जन व्यक्ति की तरह अपने चारों तरफ देखा: कहीं उसने अपनी छींक से किसी को परेशान तो नहीं किया ? Continue reading

Book Review : The White Marble Burzi and Other Stories

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In the fast paced life of these days, it is getting more and more difficult to devote time for literature. Under such circumstances, short stories come to our rescue, and by their peculiar format, provide us means to stay in touch with literature, and satiate our aesthetic and intellectual needs. The advantages brought by short stories are two fold. First, there is a sense of achievement as we can complete reading each piece in whatever time is available to us. Secondly, just in case the work is not up to our expectations, the time and effort lost would be less as compared to that in the case of novels. These are some of the reasons why I am attracted towards short stories in different languages, and from different cultures. Continue reading

ठुकेमारी और मुखेमारी : सुकुमार राय (अनुवाद)

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सुकुमार राय (1887-1923), स्रोत – विकिमीडिया

पहलवान मुखेमारी का बडा नाम था – कहते हैं कि उसके जैसा पहलवान और कोई नहीं था । ठुकेमारी सचमुच का बडा पहलवान था, मुखेमारी का नाम सुनकर उसकी ईर्ष्या का कोई अंत न था । आखिर एक दिन जब ठुकेमारी से रहा नहीं गया, तो वह कम्बल में नौ मन आटा बाँधकर, उस कम्बल  को कंधे पर डालकर मुखेमारी के घर की ओर चल दिया ।

रास्ते में एक जगह बहुत प्यास और भूख लगने पर ठुकेमारी ने कम्बल को कंधे से उतारा और एक पोखर के किनारे आराम करने के लिए बैठ गया ।  Continue reading

बिना टिकट (अभिव्यक्ति)

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बन्धुगण, आपको यह जानकर प्रसन्नता होगी कि मेरी कहानी ‘बिना टिकट’ प्रतिष्ठित ऑनलाइन हिन्दी साहित्यिक पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ में प्रकाशित हुई है । आशा है आप सभी को यह कहानी पसंद आएगी । आपके सतत स्नेह और उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद । रचना पढने के लिए लिंक

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वो (साहित्य कुञ्ज)

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मित्रों, आपको यह सूचित करते हुए मुझे अत्यधिक हर्ष हो रहा है कि मेरी रचना (शीर्षक “वो”) ऑनलाइन हिन्दी साहित्यिक पत्रिका ‘साहित्य कुञ्ज’ में प्रकाशित हुई है । आप सभी के निरंतर उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद । आशा है कि आपका स्नेह सदैव ऐसे ही बना रहेगा ।  रचना पढने के लिए लिंक 
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