
बिना टिकट (अभिव्यक्ति)



मित्रों, आपको यह सूचित करते हुए मुझे अत्यधिक हर्ष हो रहा है कि मेरी रचना (शीर्षक “वो”) ऑनलाइन हिन्दी साहित्यिक पत्रिका ‘साहित्य कुञ्ज’ में प्रकाशित हुई है । आप सभी के निरंतर उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद । आशा है कि आपका स्नेह सदैव ऐसे ही बना रहेगा । रचना पढने के लिए लिंक
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कुछ 2-4 साल पहले एक विशेष बंगाली उपन्यास पढने को मिला । उपन्यास वर्तमान समय के परिप्रेक्ष्य में लिखा गया था । कहानी में पति-पत्नी अलग हो चुके थे, माँ फ्रांस में बस चुकी थीॆ, और बेटा जो अब 25 वर्ष के आसपास था, अपने पिता के साथ रहता था । पिता-पुत्र में मैत्रीपूर्ण संबंध थे जो कि अन्यथा भारतीय समाज में विरले ही देखे जाते हैं । जो भी हो, उन दोनों के बीच हर रात को खाने के आसपास किसी न किसी बात पर वाद-विवाद होता ही रहता था । और अधिक याद नहीं । लेकिन हाँ, ऐसे ही एक विवाद के समय बेटे ने अपने पिता को एक बहुत ही सुंदर कहानी सुनाई थी, जो मुझे थोडी-बहुत याद है । उसे मैं आपके सम्मुख प्रस्तुत करना चाहता हूँ । कहने की आवश्यकता नहीं कि कहानी का सार रचनाकार का ही है, मात्र शब्द ही मेरे हैं । साथ ही, यह अनुवाद नहीं है, बस सारांश समझ लीजिए । कृपया त्रुटियों को क्षमा करें ।
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बडे नगर की सडकों पर छाता लेकर ही निकला कीजिए । इससे आप धूप से तो स्वयं को बचाएँगे ही, साथ ही चारों ओर से थूकने वालों से भी सुरक्षित रहेंगे । Continue reading

मुझे याद है दूरदर्शन पर दिखाया गया वह नाटक। जी नहीं, सीरियल नहीं, नाटक। पूर्ण कथानक तो ठीक से याद नहीं, किन्तु कुछ अंशों की धुंधली-सी स्मृति आज भी है।
एक गाँव में एक बुढिया रहती थी। काफी मिलनसार और व्यवहार कुशल। गाँव के सभी तीज-त्यौहार, समारोह, अनुष्ठानों में बढ-चढकर भाग लेती थी। चूँकि वह सबसे वरिष्ठा थी, इसीलिए उसी के सुझाव और संकेत सर्वोपरि माने जाते थे। इस पर उसे गर्व था। Continue reading

— जरा-सा सिर आगे कीजिए, बस-बस, इतना ही। तो किस क्लास में पहुँच गए जनाब?
हर शहर-देहात की तरह हमारे कस्बे में भी नाई की कई दुकानें थीं। मंसूर मियाँ उनमें से एक थे। यदि यह नाम आपके सम्मुख एक टूटा-फूटा चेहरा, हलकी दाढी, सफेद कुर्ता-पाजामा लाता है, तो आप गलत समझ रहे हैं। असल में 30-35 वर्ष का युवा कितना सुदर्शन हो सकता है, मंसूर मियाँ इसकी मिसाल थे — स्वस्थ गठा हुआ शरीर, हमेशा सीधे तनकर खडा हुआ, कमीज पैण्ट के अंदर खोंस कर पहनी हुई, बाल सलीके से काढे हुए, दिन के किसी भी समय चेहरे पर आलस्य का नाम नहीं। Continue reading

लीजिए हम आ गए। आपको बहुत प्रतीक्षा करनी पडी, इसके लिए मुझे खेद है।
आपका हिन्दी के प्रति आकर्षण एवं प्रेम स्तुति-योग्य है। आपने जो मुझे उक्त भाषा में लिखने के लिए उत्साहित तथा प्रेरित किया है, उसके लिए भी मैं स्वयं को कृतज्ञ अनुभव करता हूँ। किन्तु एक सामान्य व्यक्ति के रूप में मेरी भी कुछ सीमाएँ हैं। अपने प्रदत्त कार्य की अवहेलना करके मैं यदि साहित्य रचना कार्य में समय निवेश करूँ, तो शायद इसका अनुमोदन आप भी नहीं करेंगे। इसके विपरीत, सभी सांसारिक कार्यकलापों तथा दायित्वों को तिलांजलि देकर, एक प्रकार से संन्यास ही लेकर, सरस्वती-आराधना में मनोनिवेश करने के लिए अत्यधिक परिपक्वता की आवश्यकता है, जिसका दावा मैं नहीं कर सकता। Continue reading